मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

कविता: "काले बादल"

"काले बादल"
आने लगे है अब काले बादल।
आसमा अब काला हो चूका है 
गरज रहे है बादल आसमा में 
बिजली भी चमक रही है जोर - जोर से 
छाता का इस्तेमाल होने लगे एक तरफ से से 
बरसा रहे है अब पानी की बुँदे 
हर गली हर गाँव नया दिखने लगा अब 
नाच रहे है अब मोर कर के खूब सोर 
सब कुछ धूल गया हो मानो 
आँखे खुल गई हो मनो 
बारिश हो रही है खूब 
आते जा रहे है काले बादल 
आने लगे है अब काले बादल।
आसमा अब काला हो चूका है 
कवि: अजय II, कक्षा: 6th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"




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