"लक्ष्य"
इरादे छोटे है हमारे।
छोटे - छोटे डेग को जब हम बढ़ाते है ।।
हम कुल जैसे भरते जान है ।
भले ही नाजुक सोच हमारी है।।
लक्ष्य को हमारे गले लगाने का विचार गहरे है ।
पहुँचेंगे मुकाम पर अपने ।।
यह हमने भी किया है तय ।
रहना है हरहाल में पाकर ।।
इस विषय पर हमें विजय।
कवि: अजय II, कक्षा: 6th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"
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