रविवार, 1 फ़रवरी 2026

कविता: "अँधेरी रात हो रही है"

"अँधेरी रात हो रही है"
अँधेरी रात हो रही है।  
न जुगनू है न तारे है आसमा में । 
ऐसा क्यों लगता है की चाँद का मुखड़ा नराज़ सा है ?
 सब तरफ सन्नाटा और दर्द से भरे हुए है । 
आशा की उम्मीद मानो जैसे बस कम हो। 
मन चाहत की कब सवेरा हो । 
सूरज की किरणे एक बार फिर आसमा का हो । 
आते रहते है इन्सेक्ट की आवाजे । 
बड़े ही खतरनाक लगता है सुनने में । 
 दर का माहौल बना देता है रातो में । 
 अँधेरी रात हो रही है । 
न जुगनू है न तारे है । 
 दूर - दूर तक कुछ दिखाई नहीं देता है । 
काली परछाई का राज चलता हो 
हर रात बस उनका हो ।  
कब एक बार फिर से सूरज आसमा में होगा  
आशा की उम्मीद अपना होगा।। 
चमकता सूरज हमारा हो ।  
कवि: निरंजन कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"