शनिवार, 29 मई 2010

कविता :बर्बाद हो रही बिजली

बर्बाद हो रही बिजली
रोड़ों पर जल रही है बिजली ।
देखो कितनी बर्बाद हो रही है बिजली ,
बिजली को पाने के लिए ।
होते रहते शहर-गाँव में धरने तमाम ,
फिर क्यों रोड़ों पर जला रहे दिन में ।
कितनी सारी बिजली ,
बिजली से ही चल रहे कूलर येसी आदि ।
इसलिए हो रही बिजली की बर्बादी ,

लेखक :ज्ञान कुमार
कक्षा :
अपना घर

6 टिप्‍पणियां:

Jandunia ने कहा…

nice

माधव ने कहा…

सही कहा

Udan Tashtari ने कहा…

अच्छा है बिजली की बेवजह बर्बादी नहीं होना चाहिये

Pragati ने कहा…

ekdam sahi kaha,gyan bhai

raj porwal ने कहा…

ऐसे ही लिखना पर्यावरण को बचाने में आप का भी योगदान चाहिए, अच्छी कविता.

अक्षिता (पाखी) ने कहा…

सुन्दर कविता...सार्थक सन्देश..बधाई.


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