गुरुवार, 24 अक्टूबर 2013

पेपर हूँ

पेपर हूँ  मै  पेपर हूँ कितना अच्छा पेपर हूँ जब पेपर छप के आता सब बच्चो को पढ़ने में मजा आतासब बच्चो का मन खुश हो जाता पेपर हूँ   मै  पेपर हूँ ।  पेपर हूँ  मै  पेपर हूँ।  

                                        प्रभात सिंह
                                     अपना घर  ,   कक्षा 2 





मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

कविता: मौसम

मौसम 

नीले - नीले  आसमान में ।
पानी है काले - काले बादल में।। 
बादल है या कोई छाया है। 
यह तो ईश्वर की माया है।। 
पानी कब ये बरसेगा ?
इन्सान कब तक तरसेगा  ? 
जब भी ये पानी बरसेगा।
धरती को पहले सीचेंगा ।।
हम खूब नहायेंगे पानी में। 
कागज की नाव तैरायेंगे नाली में ।।
पानी में झम - झम कूदेंगे।  
 सबके संग हम भीगेंगे।।
पानी पाकर धरती में होगी हरियाली।  
घर घर में छाएगी फिर खुशहाली।। 
 कवि :  नितीश कुमार 
अपना घर, कक्षा: 3rd 

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

''किस किस की सुरक्षा ''

''किस किस की सुरक्षा ''
मुकेश अम्बानी जैसे उद्योगपति ,
खतरे से नहीं है खाली 
सरकार हमारी दे रही गाली । 
उनकी सुरक्षा के  लिए सी .आर .पी .ऍफ़ बल शाली ॥ 
सरकार को चिंता है तो पैसे वालो की ,
भाड़ मे  जाए दुनियादरी ,
लूट रही है जिसकी आबरू ,
वो है इस जंहाँ की सारी नारी 
नारी की सुरक्षा करना ,
उन पर हुए जुल्म का ,
उनको इन्साफ दिलाना ,
दायित्व हमारी सरकार का । 
ऐसा क्या बात है अम्बानी मे ,
जो उन्हें सुरक्षा देने  की तैयार ,
 सुरक्षा देना है तो सबको दो ,
मजदूर ,किसान हो बेरोजगार जनता सारी ,
 सारे उद्योग - धंधे चलते है ,
मजदूरों के बल पर ,
कृषि करे किसान भईया ,
बिना सुरक्षा अपने दम पर ,
ऐसा नहीं न होना चाहिए ,
सबको एक सामान अधिकार चाहिए ,
चाहे वह हो पैसा वाला ,
या हो वह मजदूरी  करने वाला  ,
सवाल हमारा यही है ,
हम इसको ही दोहराए ,
किस -किस की सुरक्षा की जाए ,
यह सरकार हमें बताये । 
नाम : आशीष कुमार 
कक्षा :१ १ 
अपनाघर , कानपुर 


सोमवार, 22 अप्रैल 2013

कविता : प्राणी जा रहा

 प्राणी जा रहा 

प्राणी बड़ा ही बंधा हुआ ,
साबित होता जा रहा है .....
हर एक प्राणी ,
प्राणी के पीछे से जा रहा है .....
जो वो कर रहा है,
वही करने की वो सोच रहा है ......
न उसकी अपनी समझ है ,
न ही अपनी सोच है ......
जो देख रहा है प्रक्रति और संसार से ,
वो वही कर रहा है ......
हर एक प्राणी ,
प्राणी के पीछे जा रहा है ......
अब वह समय दूर  नहीं ,
जिसमें प्राणी को प्राणी बाधेगा .....
आँगन की उस चौपाल में,
जहां प्राणी ही प्राणी आयेगा .....
प्राणी को देख के ,
प्राणी के मुख में मुस्कान होगी .....

 हर एक प्राणी ,
प्राणी के पीछे जा रहा है .......

                           लेखक  : अशोक कुमार
                           कक्षा : १०
                           अपना घर

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

कविता - मुकाम पा लिया

 मुकाम पा लिया 

भोर का समय था ,
मैं  जा रहा था राहों से .....
सून- सान थी सारी जगह ,
मैं डर रहा था तम के गर्दिश में .....
सहसा चली पवन तीव्रता से ,
भागे काले मेघ डरकर ....
खिल उठा रवि हंसकर ,
मन से निकला मेरे डर .....
पवन थी इतनी ठंडी ,
ताजगी भर गयी मेरे जीहान में ....
आगे बढ़ा तो एक तितली आयी ,
आ बैठी मेरे हाथ में ......
कितने वर्णों की थी ,
की मैं  कुछ कह नहीं सकता .....
 देख - देख मैं खूब हंसता ,
उसकी सुन्दरता के बारे में सबसे कहता .....
जिस कार्य से निकला था ,
वह कार्य मैं तो भूल गया .....
आ गयी मेरी मंजिल ,
मैने अपना मुकाम पा लिया ...

                                                             लेखक -आशीष कुमार
                                                             कक्षा -१०
                                                             अपना घर  

कविता - क्यों नहीं याद

 क्यों नहीं याद 

वो भगत का शहीद खून ,
वो जवानी झांसी की रानी की  ........
जो झकझोर दिया था ,
उन गोरे अंग्रेजों को ......
लेकिन आज के इस भ्रस्ट समाज में,
भ्रस्टाचारियों की है भरमार ......
इन  भ्रस्टाचारियों से ही ,
चल रही है हमारी ......
मिली जुली सरकार ,
आज के इस  भ्रस्ट समाज में ......
रह - रहे हैं सभी एक साथ ,
अपने हक़ को मांगने के लिए .....
आगे बढ़ नहीं रहे कभी ,
क्यों हम किसी का जुल्म सहें ?
क्यों न हम अपना हक़ लेकर रहें?

                                                          लेखक -ज्ञान कुमार
                                                          कक्षा -९
                                                          अपना घर 

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

कविता - मेरा गाँव

              कविता

 मेरे गाँव की सुनों कहानी ......
लाइट के प्रति हो रही मनमानी,
कभी रात में लाईट आती है ....
तो कभी हमेशा के लिए जाती है,
विधुत व्यवस्था  है बड़ी ख़राब .....
इस पर चलता है केस्को का राज,
विधुत से गाव के लोग परेशान ......
इसीलिये नहीं है गाँव की शान ,

                                        लेखक -मुकेश कुमार
                                         कक्षा -  १ १ 

शनिवार, 16 मार्च 2013

               कविता 

इंसान के लिए हमदर्दी नहीं पत्थर दिल इंसान में ,
 से मरते हैं लोग इस जहांन में .......
दुनिया को देखिये चाँद तक पहुंच गयी ,
ईश्वर पर अब भी विश्वास करते हन्दुस्तान में .....
पड़ोसी चाहे भूंख से तडपता रहे लेकिन ,
फल,दूध आदि पहुचाते हैं ईश्वर के मकान में .....
ईश्वर तो लोगों के दिलों में बसे हैं, 
क्यों ढूढ़ते हो पत्थर की मूर्ति और आसमान में ?
भुखमरी हटाने का वादा तो करते हैं ये नेता ,
लेकिन ताकत नहीं उनके जिस्मों जान में  .....


                                              लेखक : धर्मेन्द्र कुमार 
                                              कक्षा :९ 
                                              अपना घर 

गुरुवार, 14 मार्च 2013

    कविता

रोड और क्रासिग पर ,
गाडी और मोटर कारों की.......
लगी रहती है कतार ,
ट्रैफिक पुलिस की बात निराली .......
करते हैं अपनी मनमानी ,
लगे रहते हैं लोडर ट्रकों से .......
रुपयों की वशूली करने ,
ट्रैफिक नियमों का ......
पालन नहीं कराते ,
लोडर ट्रक वालों को है गरियाते.......


             लेखक : जीतेन्द्र कुमार
             कक्षा : ९
             अपना घर 

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बुधवार, 13 मार्च 2013

कविता : मंहगाई

"मंहगाई"

मंहगाई ने आसमान छू डाला ,
गरीबों को तो भूखा मार डाला .....
सब्जी मंहगी, अनाज मंहगा,
अब तो हर सामान है  मंहगा .....
पेट्रोल तो इतना मंहगा हो गया,
गाड़ियों में पेट्रोल डलवाना .....
कितना ज्यादा मंहगा पड गया ,
नया नेता बनाने से ......
कुछ बदलाव नहीं आया ,
सभी चीजों को मंहगाई ने है खाया ......

नाम : चन्दन कुमार, कक्षा : ७, अपना घर 

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

शीर्षक : ठंडी

              "ठंडी"
इस बार ठण्ड का आया मौसम ।
जिससे की सारा शहर गया सहम ।।
तूने न पहचान ये तेरा है भ्रम ।
सर्दी में बोले हर -हर गंगे हम ।।
सूरज न दिखता , ये तेरा है भ्रम ।
सर्दी में कोहरे का कोहराम ।।
सुन लो बच्चो सुन लो तुम ।
छुट्टी में कर लो आराम ।
इतना भी न करना आराम ।।
कि कोई न दे तुमको काम ।
कुछ काम करो और हो जाओ लायक ।
जिससे न कहा पाए कोई मक्कार , निक्कमा ,नालायक !
नाम : आशीष कुमार, कक्षा 10, अपना घर, कानपुर