शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

कविता ताजी खबर

ताजी खबर
आज की ताजी खबर ,
उल्लू चोंच दबाकर भागा.....
नेता जी को गुस्सा आया,
ली फिर मदद पुलिस की....
नेता जी ने लड़ा मुक़दमा,
गये बेचारे हार.....
आज की ताजी खबर,
उल्लू चोंच दबा कर भागा.... लेख़क -अनुज कुमार
कक्षा-
स्कूल -आर.के .मिशन स्कूल कानपुर

शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

कविता मोर हमारा

मोर हमारा
मोर हमारा कितना रंग बिरंगा ,
फुदुक फुदुक कर नाच दिखाता....
फुर्र फुर्र कर वह झट उड़ जाता ,
मोर हमारा कितना रंग बिरंगा ....
हमारे पास न आता वो,
न हमारे संग खेला करता ....
फुर्र फुर्र कर वह झट उड़ जाता ,
मोर हमारा कितना रंग बिरंगा .....
लेख़क चन्दन कुमार कक्षा ५ अपना घर कानपुर

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

कविता कौन वीर

कौन वीर
कोहरा वीर न ,
बदल वीर सबसे....
बड़ी हैं सर्दी वीर,
सर्दी में सिकुड़ जाते ....
हैं ठिठुर जब हम,
जाते हैं सूरज को....
बुलाते हैं जब नहीं,
वह आता गुस्सा....
हमें आता.....
लेख़क सोनू कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

कविता देंगे हम को सदा सहारा

देगे हम को सदा सहारा
सत्य पथ के हम रही ,
हम अच्छे बच्चे उत्साही.....
हँसी खुशी में सदा रहते,
झगड़ा कभी नहीं हम करते....
हँसते और हँसाते रहते,
अपना घर में हम.....
प्यार सभी से करते हैं,
कभी न रोते और रुलाते.....
सब के मन को सुख पहुंचाते,
सब के गीत बनेगे बच्चे....
सच्चे मन के अच्छे बच्चे,
सारा जग परिवार हमारा.....
देगे हम सबको सदा सहारा,
विजय दीदी का यही हैं नारा.....
सबको शिक्षा यह अधिकार हमारा.....
लेख़क प्रदीप कुमार अपना घर कानपुर

बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

कविता क्या होगा उनका

क्या होगा उनका
बाढ़ के प्रभाव से ,
संसार के हर गाँव में ....
लोग हुये परेशान,
डूब गये उनके घर द्वार....
उसमे से कुछ डूब गये
उन्ही में कुछ बचे....
जो बचे वो हो गये बेघर,
जो बचे तो घूम रहे....
उनको लोग देख रहे,
जहाजो से कुछ खाने को पंहुचा रहे ....
वे पैकटो को ऊपर से लोक रहे,
लोकने में कुछ कुचल गये
कुचल कर वही मार गये
क्या होगा उनका.....
क्या मिलेगा उन्हें मुआवजा .....
लेख़क अशोक कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

कविता गुडिया प्यारी

गुडिया प्यारी
क्या कहती हैं गुडिया प्यारी ,
क्या मागती हैं गुडिया प्यारी....
खाने को मागती हैं गुडिया प्यारी ,
ठुमुक ठुमुक कर नाचती हैं गुडिया प्यारी.....
सबका मन बहलाती हैं गुडिया प्यारी,
सब को लगती हैं गुडिया प्यारी.....
क्या कहती हैं गुडिया प्यारी ,
क्या मागती हैं गुडिया प्यारी....
लेख़क ज्ञान कक्षा अपना घर कानपुर

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

कविता :तितली आई

तितली आई

तितली आई तितली आई ।
रंग-बिरंगी तितली आई ॥
फूलों पर वह जाती है ।
मुंह में रस भर लाती है ॥
मीठे गीत सुनाती है ।
सबका मन बहलाती है ॥
तितली आई तितली आई ।
रंग-बिरंगी तितली आई ॥

लेख़क :अजय कुमार
कक्षा :
अपना स्कूल

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

कविता रेल चली

रेल चली
रेल चली रेल चली ,
छुक छुक करती रेल चली ....
डग मग करती रेल चली,
एक डिब्बे में पहिये होते चार....
लोग बैठे होते एक हजार,
उसमे से आधे होते गरीब....
ज्यादा होते हैं अमीर,
रेल चली रेल चली....
लेख़क चन्दन कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

कविता :समाज को मूरख कहते

समाज को मूरख कहते

ये समाज है बुराइयों का ,
नहीं ठिकाना किसी की बात का .....
कौन सही है,कौन है गलत ,
नहीं किसी के पास कोई सबूत .....
सबूत है पर गवाह नहीं ,
जिन्दगी की राह पर किसी की कोई परवाह नहीं .....
जिसको नहीं है कोई परवाह ,
उसी को कहते हैं लापरवाह .....
लापरवाही करना हैं बहुत खराब ,
लोगों के पैसे चोरी कर लोग पीते हैं शराब .....
समझदार भी नासमझ की बाते करते ,
नहीं किसी के वो आगे झुकते .....
बाते करना है बहुत असान ,
पर ये पता नहीं की कैसे करें सभी का सम्मान .....
पता भी होता तो ये क्या करते ,
यही समाज को मूरख कहते .....

लेख़क :आशीष कुमार
कक्षा :
अपना घर

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

कविता किसी को महशुस न करते

किसी को महशुस कराते
खूब चले अपने पैरो से ,
थकते तो किसी न कहते शाम को ....
एवं चुप रहते हर दम,
अपने दर्द को छिपाते अपनी आखों से......
कुछ न कहते निकलते आंसू तो,
फिर अगले दिन वही करते,
चलते अपने पैरो से....
पहुचाते मंजिल के किनारे,
कुछ संकट होता तो किसी से कुछ न कहते......
अपना फैसला खुद अपने आप करते,
अपने बदन से अपने दर्द को.....
अपनी आँखों में लाते,
लेकिन उसे आंसू के सहारे न निकालते.....
उस दर्द को मुस्कराहट से निकालते,
अपना दर्द अपने आप में बाँटते.....
किसी को दर्द महशुस न कराते .....


लेख़क अशोक कुमार कक्षा अपना घर कानपुर

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

कविता समय की बात

समय की बात
समय समय पर क्या होता,
हर गाँव शहर में आदमी रोता.....
कोई रोटी के लालच में,
कोई पैसो के लालच में .....
समय समय पर क्या होता,
हर गाँव शहर में आदमी रोता .....
आदमी भूख से ही मार जाता,
और पता नहीं क्या होता....
जिधर भी देखो उधर ही,
आदमी ही हैं रोता.....
लेख़क ज्ञान कक्षा अपना घर कानपुर