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सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

शीर्षक :- धरती उठी थी खिल

  शीर्षक :- धरती उठी थी खिल
   भोर का समय था ,
   आसमान में चन्द्रमा की रोशनी ।
   फैली थी पूरी धरती पर ,
   आसमान मे काले बादलो का डेरा ।
   चन्द्रमा को घेर रहा था ,
   मैं यह देख रहा था  बैठा छत पर ।
   उसी समय  चन्द्रमा पर संकट आया था ,
   देख नजारा हवा ने मंद हँसी से मुस्काया ।
   देखते ही  देखते उसने  ऐसा रूख बदला ,
   जिससे काले बादल चंदा पर कर सके हमला ।
   पूर्व से पश्चिम को चली ,
   उत्तर से दक्खिन   को चली ।
   पवन के झोंको ने सारे बादलो को दिया झोर ,
   बेचारे डर कर भागे देख हवा का शोर ।
   अब चंदा का संकट गया था टल ,
   देख शशि की ज्योति सारी  धरती उठी थी खिल ।
नाम :आशीष कुमार 
कक्षा :10
अपना घर ,कानपुर 

बुधवार, 23 मार्च 2011

कविता - मच्छर का गाना

कविता - मच्छर का गाना 
सुनो -सुनो सब भाई- बहना ,
मैंने सुना हैं मच्छर का गाना ...
गाने में क्या लय थी और सुर ताल,
सुनकर गाना हुआ  मैं बेहाल ...
गाना तो वह  ऐसा गाते ,
हाँ -हाँ कर जैसे हम हँसते....
ज्यादा गाना याद नहीं हैं ,
ये बात हकीकत हैं कोई जोग नहीं हैं .....
एक लाईन याद मुझे हैं आयी ,
खून पियेंगे हम सब मच्छर भाई....
नींद खुली जब हमने देखा ,
मुझे हुआ बहुत ही धोखा ....
मच्छरों का मुझ पर जाल बिछा था ,
एक मच्छर आ कान में कुछ कह रहा था .....
सो जा मेरे प्यारे राजा मुन्ना ,
हम पेट भरेंगे सुना के तुझको गाना....
लेखक - आशीष कुमार 
कक्षा - ८ अपना घर , कानपुर