सोमवार, 1 अक्तूबर 2012

शीर्षक :- धरती उठी थी खिल

  शीर्षक :- धरती उठी थी खिल
   भोर का समय था ,
   आसमान में चन्द्रमा की रोशनी ।
   फैली थी पूरी धरती पर ,
   आसमान मे काले बादलो का डेरा ।
   चन्द्रमा को घेर रहा था ,
   मैं यह देख रहा था  बैठा छत पर ।
   उसी समय  चन्द्रमा पर संकट आया था ,
   देख नजारा हवा ने मंद हँसी से मुस्काया ।
   देखते ही  देखते उसने  ऐसा रूख बदला ,
   जिससे काले बादल चंदा पर कर सके हमला ।
   पूर्व से पश्चिम को चली ,
   उत्तर से दक्खिन   को चली ।
   पवन के झोंको ने सारे बादलो को दिया झोर ,
   बेचारे डर कर भागे देख हवा का शोर ।
   अब चंदा का संकट गया था टल ,
   देख शशि की ज्योति सारी  धरती उठी थी खिल ।
नाम :आशीष कुमार 
कक्षा :10
अपना घर ,कानपुर 

1 टिप्पणी:

Akshitaa (Pakhi) ने कहा…

Bahut pyari kavita..badhai,