शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

पढ़ते पढते ठंडी आ गया

 कविता 

पढ़ते पढते ठंडी आ गया 
कुछ पता नहीं चला 
पढते पढते ठंडी आ गया 
कुछ पता नहींचला 
 सपनो में सोचा की 
ठंडी कितनी जल्दी आ गया 
वो भी हमको पता नहीं चला 
पढ़ते पढ़ते ठंडी आ गया 
कुछ हमको पता नहीं चला 

यह कविता हमारे कवी विष्णु द्वारा  लिखी गयी है | ये अपना घर में 2024 में आये  थे |  ये इस वक्त कक्षा 4 मे पढ  रहे है  | 

 

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