कविता
पढ़ते पढते ठंडी आ गया
कुछ पता नहीं चला
पढते पढते ठंडी आ गया
कुछ पता नहींचला
सपनो में सोचा की
ठंडी कितनी जल्दी आ गया
वो भी हमको पता नहीं चला
पढ़ते पढ़ते ठंडी आ गया
कुछ हमको पता नहीं चला
कुछ पता नहीं चला
पढते पढते ठंडी आ गया
कुछ पता नहींचला
सपनो में सोचा की
ठंडी कितनी जल्दी आ गया
वो भी हमको पता नहीं चला
पढ़ते पढ़ते ठंडी आ गया
कुछ हमको पता नहीं चला
यह कविता हमारे कवी विष्णु द्वारा लिखी गयी है | ये अपना घर में 2024 में आये थे | ये इस वक्त कक्षा 4 मे पढ रहे है |
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