सोमवार, 24 नवंबर 2025

कविता: "नए - नए उतरे हो अभी रहो पर"

"नए - नए उतरे हो अभी रहो पर"
 ख्यालों में खो रहे हो अभी से राहो पर,
तर्क करते हो बुजूर्गो के तजुर्बो पर ,
जिंदगी जो जी रहे हो यादो में। 
इसके किस्से रहते है उनके जज्बातो में ,
उड़ाने आओ असल जिंदगानी में। 
नादान हो तुम अभी ,
भीतर से खोखले और कमजोर हो अभी ,
खोओ नहीं किसी और की दुनिया पर ,
क्यूंकि नए नए उतरे हो रहो पर अभी। 
हाव - भाव से बहुत कुछ बदलाव दीखते है बाहर ,
इन बदलावे के लक्षण, खिखते है खतरनाक ,
ज्यादा बड़े नहीं हुए अभी। 
तर्क करो बुजूर्गो से इतने बड़े नहीं हो अभी,
अभी ठहरो जमी पर ,
क्यूंकि नए - नए उतरे हो रहो पर। 
कवि: साहिल कुमार, कक्षा: 9th,
अपन घर 

रविवार, 23 नवंबर 2025

कविता: "मेरा बचपन"

 "मेरा बचपन"
वो बचपन का क्या जवना था, 
जब कार्टून के फोटो हमारे लिया खजाना है। 
न काम की टेंसन न पढ़ाई की चिंता ,
बस मौज मस्ती में ही मन लगाना था ,
सुबह घर से बहार निकल जाना ,
और पुरे दिन न किसी का ठिकाना था। 
बस गुल्ली ठंडा खेलना और चिड़ियाँ को देखना ,
 दिन भर का यही एक ठिकाना था ,
बिन बताए घर से बहार जाना था ,
वो बचपन का भी किया जवना था। 
कभी कभी तो घर का ही ठिकाना था ,
पेट दर्द तो एक बहाना था। 
स्कुल बंक करना एक बहाना था ,
वो बचपन का भी किया जवना था ,
जब 75 % अपने जिंदगी को उड़ाना था ,
वो बचपन का क्या जवना था। 
कवि: गोविंदा कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर। 

शनिवार, 22 नवंबर 2025

कविता: "मेरे पापा"

"मेरे पापा"
सुबह से लेकर शाम तक काम है वे करते, 
मेहनत कर के खाने को एक तिनका है लाते,
उनके काम भी आसान नहीं होते,
बड़ी ही मुश्किल से रातो को चैन की नींद सो पते। 
इस ठंडी की आग में, करते है वो दिन रात काम, 
हाथो पर अभी भी है पड़े छाले, फिर भी उनके सपने है बड़े निराले। 
अपनी परिवार के लिए सब कुछ करते है,
हर त्यौहार में अपनी परिवार के ख़ुशी के लिए,
कही देर न हो जाए इसलिए समय से पहले आ जाते है, 
 खिलौने नहीं तो खाने को ही सही ले आते है। 
 उनके मेहनत से बड़े - बड़े इमारत खड़े है, 
 फिर भी वे देश के किसी कोने में लचार से पड़े है। 
उनको भी तो कुछ हक़ दो, नहीं उनके बच्चों पढ़ने दो,
उनके वो नन्हे - मुंहे बच्चे पढ़ने को बेताब है ,
उन्हे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए बस एक बास्ते से भरी किताब दो,
 आसमान ज्यादा दूर नहीं है किताबो की जरिए उन्हें उड़न भरने दो।
कही देर न हो जाए इसलिए समय से पहले आ जाते है, 
घर के किसी कोने में वे सो जाते है।  
कवि: निरु कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर। 

शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

कविता: "मेरा बचपन"

"मेरा बचपन"
वो भी क्या यादे थी ,
बचपन भी दोस्ती यारी के बीच गुजारी थी ,
शैतानी तो करते ही साथ में पढ़ते भी थे। 
ख़ुशी तो मिलती थी साथ खेला करते थे 
एक तरफ दोस्तों का प्यार तो दूसरी तरफ माँ और पापा का प्यार ,
सबके साथ बैठ कर खाना खाना , 
हाथ बहार जाकर धोना तो एक बहाना था ,
बिन बताए घर के बाहर तो जाना ही था ,
वो भी क्या यादे थी। 
घूमना तो एक बहाना था , 
असली बात तो यह थी की दोस्तों के ,
 साथ कही बेर तोड़ने जाना था। 
कवि: शिवा कुमार, कक्षा: 9th, 
अपना घर। 

गुरुवार, 20 नवंबर 2025

कविता: "बताए रखना"

"बताए रखना"  
ये बात हवाओ को भी बताए रखना,
अंधेरी रोशनी में भी चिराागो को जलाऐ रखना। 
जिस वीरो के नाम से काँप उठती थी ब्रिटिश ,
उन वीरो को अपने दिलो में बसाए रखना। 
ये बात हवाओ को भी बताए रखना। 
वीरो ने अपनी लहू को देकर अपने देश की हिफाजत की ,
उस देश के तिरंगे की शान हमेशा बनाए रखना। 
ये बात हवाओ को बताए रखना। 
कवि: रवि कुमार, कक्षा:4th,
अपना घर 

बुधवार, 19 नवंबर 2025

कविता: "बढ़ती ठंडी"

"बढ़ती ठंडी"
ये  मौशम भी न कितना सुहाना है ,
इस ठंडी को भी हर साल नवंबर में आना है। 
कर देता है मुशिकल जीना ,
यहाँ तक की पानी को कर रखता है ठंडा ,
स्वेटर हो या जैकेट सबको करता है फ़ैल ,
ये ठंडी कर देता है कम्बल को भी फ़ैल। 
रातों को ओस गिरता है ,
सबको घर में ही बैठता है।
ये मौशम भी न कितना सुहाना। 
अब रात हो रही है लम्बी दिन को कर दिया है खबरदार ,
रुक - रुक कर चल है अब हमारी जिंदगी इस ठंडी के मौशम में ,
मुशिकल कर रखा है जीना बिन कम्बल में। 
ये  मौशम भी न कितना सुहाना है ,
इस ठंडी को भी हर साल नवंबर में आना है। 
कवि: निरु कुमार, कक्षा: 9th, 
अपना घर। 


मंगलवार, 18 नवंबर 2025

कविता: "जन्मों का रिस्ता"

"जन्मों का रिस्ता"
ऐ मेरे दोस्त , इस दोस्ती को भूलना मत,
ये दोस्ती का रिस्ता तोड़ना मत ,
चाहे कुछ भी हो जाए तुम , 
हमें मत भूलना ऐ मेरे भाई। 
हर एक परेशानी में काम आएंगे एक दूसरे के ,
चाहे जो भी हो जाए , एक साथ रहेंगे एक दूसरे के। 
हमारी दोस्ती भी कितनी हसीन है , 
जैसे खुसबू से महकता हर एक दिन है। 
साथ चले तो राहो आसान हो जाती है ,
दोस्ती से जिंदगी में रौनक सी छा जाती है। 
 ऐ दोस्त मेरे हमेशा मेरे साथ ही रहना तुम ,
सब कुछ खो जाए पर न खोना तुम। 
लड़ाई कर के भी साथ रहेंगे, भले ही हमारे बिच छुपी छा जाए,
फिर बात करेंगे तुम एक दूसरे से। 
उदास स चेहरा मत बनाना तुम ,
रोने के जगह हसना तुम। 
अपने आँशु को संभलकर रखना ऐ मेरे दोस्त,  
ये मोती से दिखने वाले, करोड़ो में बिकने वाले,
अपने भी है बहुत से चाहने वाले। 
कवि: नीरज कुमार, कक्षा: 5th,
अपना घर। 




सोमवार, 17 नवंबर 2025

कविता: "ठंडी का मौशम"

"ठंडी का मौशम"
 ठंडी धीरे धीरे बड़ रही है ,
दिन छोटे तथा राते लंबी है ,
 सभी के जुबान में एक ही चीज ,
है की बहुत सर्दी हो  रही है। 
लड़के - बच्चे , बूढे दादा ,
सब है ओढ़े है साल ,
पता नहीं कब जाएगी सर्दी। 
शायद लग जाए कई साल ,
सर्दी में कपकपी छूटी है ,
क्यूंकि ये मुस्कान सर्दी की जूठी है। 
कवि नसीब कुमार, कक्षा: 3rd,
अपना घर। 

रविवार, 16 नवंबर 2025

कविता: "कविता"

"कविता"
कविता ऐसा हो जिसमे मजा आए ,
रस हो खिलखिलाहट हो ,
जो पढ़ने में भा जाए, 
पहाड़ हो, रंग - बिरंग तितलियाँ हो ,
अहसास हो उस पल का। 
तेज हवाए और आंधी भी हो ,
फसले भी खिल उड़े और हरियाली भी ,
जो दिल और दिमाग में समा जाए ,
कविता ऐसा हो। 
कवि: रमेश कुमार, कक्षा: 5th,
अपना घर। 


कविता: "14 नवंबर"

"14  नवंबर"
 आज चाचा नेहरू के फोटो पर फूल चढ़ाते है ,
वो नही है तो क़्या हुआ ,
हम फिर भी उनकी जयंती मानते है। 
 वापस खुशियाँ चाचा नेहरू पर आती है ,
यही खुशियाँ चाचा की याद दिलाती है।  
वह बच्चो के सिखाते थे, की कोशिश करते रहो ,
यह आकाश तुम्हारा है, मिलेगा तुमको सब कुछ तुमको ,
बस संघर्ष तुम्हारा हो। 
 आज चाचा नेहरू के फोटो पर फूल चढ़ाते है। 
कवि: गोविंदा कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर। 

कविता: "बहारों का साथ छोड़ना"

"बहारों का साथ छोड़ना"
 ए सदाएँ पूछती है इस बहारों से, 
क्या जिया तुमने दुनिया में ?
जिंदगी भी रूठी और साथ भी छूटा ,
न जाने कैसा रिस्ता टुटा ,
हर बदलते मौशम में ,
कशमकश भरी जिंदगी में ,
मिलती नहीं नजरे - नजरे से ,
मुस्कुराकर छिप जाती है इन भीड़ भरी सड़के पे। 

बहारो ने रास्ता छोड़ा, सदाओं ने साथ भी,
आँखों ने रोना छोड़ा, चेहरे ने मुस्कुराना भी ,
बहारो ने साथ छोड़ा और तुमने हाथ भी ,
जिंदगी भी रूठी और साथ भी छूटा।

अब पूछती है सदाएँ इन बहारों से ,
क्या जिया तुमने दुनिया में ,
जिंदगी भी रूठी और साथ भी चुटी ,
न जाने कैसे ये रिस्ता टुटा। 
कवि: साहिल कुमार, कक्षा: 9th,
अपना घर।