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शनिवार, 10 अप्रैल 2021

कविता : " रात को बैठकर कवित लिख रहा हूँ "

  " रात को बैठकर कवित लिख  रहा हूँ "

रात को बैठकर कविता लिख रहा हूँ ,

कितनी मुश्किल जिंदगी जी रहा हूँ  |

तो भी हसी - ख़ुशी से जी रहा हूँ  ,

यही तो हमारी जिंदगी है  |

बस अच्छे से जी रहा हूँ  ,

जिंदगी में मुश्किल परिस्थिति आती | 

उस से लड़ के जी रहा हूँ  ,

लड़ -लड़ के आगे बड़  रहा हूँ | 

जिसको हसिल करना  है उसी के पीछे दौड़ रहा हूँ

कवि : अजय कुमार , कक्षा : 7th , अपना घर

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

कविता :" वो सुनहरी धुप "

"सुबह की  वह सुनहरी धुप "

सुबह की वह  सुनहरी धुप ,

जो बिना बोले चमक आती है |

सही समय नहीं होने पर ,

आपने आप गयाब हो जाती है |

न लगती न चुभती है ,

मन के भीतर तक है | 

सभी दिमाग के तार को ,

फिर से एक्टिव करजाती है |

ये सुनहरी धुप ,

जिसके अनेक है रूप  | 

लेकिन मन को  मोह जाती है ,

सुबह की वह सुनहरी धुप |  

कविता :  प्रांजुल कुमार , कक्षा : 12th , अपना घर

गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

कविता : " नसीब भी क्या खेल खलती है "

  " नसीब भी  क्या खेल खलती है "

नसीब भी  क्या खेल खलती है ,

कही किसी चीज की जरूरत और दूसरी तरफ | 

सारे रस्ते बंद कर देती है ,

पता नहीं चलता की |

हमे चलना किस तरफ  है ,

क्योकि किस्मत की | 

दरवाजे बंद हर  तरफ है ,

लेकिन हर एक दरवाजो पर |

दस्तक देना  जरूर है ,

क्योकि हम तो मजबूर है | 

पर इस अंधेरे  भी रोशनी ढलती है ,

नसीब भी क्या खेल खेलती है | 

कवि : देवराज कुअंर , कक्षा  10th ,  अपना घर

 

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

कविता : " जब हम नराज होते है "

  " जब हम नराज होते है "

 जब हम नराज  होते है ,

अक्सर सब कुछ छोड़ देते है |

हर  किसी की बात कड़वी लगती है ,

हमारी नसों में खून ऊपर से निचे दौड़ती  है | 

खाना --पीना सब त्याग देते है ,

सब से मुँह मोड़ देते है | 

अपनी दुनियाँ में खोए रहते  है ,

आपने सपनो  में खोए रहते है | 

जब हम नराज होते है ,

अक्सर सब कुछ छोड़ देते है | 

कवि : कुलदीप कुमार , कक्षा : 10th  , अपना घर

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

कविता :" पेड़ पौधों ने ली अंगड़ाई "

" पेड़ पौधों ने ली अंगड़ाई "

 पेड़ पौधों ने ली अंगड़ाई ,

आम ने डाली को झुकाई | 

तूफान ने किया पेड़ो पर अत्याचार ,

सब पेड़ पौधों का हो रहा बुरा हाल | 

जब से गर्मी का ये सीजन आया ,

फल फूल को सूखाते आया | 

काश कोई इसका दर्द जान पाता ,

फिर भी पेड़ में आम लटक आता | 

 पेड़ पौधों ने ली अंगड़ाई ,

आम ने डाली को झुकाई | 

कवि : सार्थक कुमार , कक्षा : 10th , अपना घर

सोमवार, 5 अप्रैल 2021

कविता : " कोरोना ने फिर से किया हमला "

  " कोरोना ने फिर से हमला किया "

 कोरोना ने फिर  से हमला किया ,

 स्कूल जाना बंद किया | 

लॉकडाउन में क्या किया ,

घर में रहते  - रहते हो गए बोर | 

फिर भी कोरोना को ,

भागने में लगा रहे जोर | 

क्योकि कोरोना है हराम खोर | 

 डॉक्टर  लगा रहे जोर ,

कोरोना को भगा कर मचाएँगे शोर | 

घर में बैठे -बैठे हो रहे बोर ,

फिर बच्चे मचाते है शोर | 

कवि : अजय कुमार , कक्षा : 7th , अपना घर

रविवार, 4 अप्रैल 2021

कविता : " मै अब भी याद करता हूँ उस पल को "

 " मै अब भी याद करता हूँ उस पल को "

मै अब भी याद करता हूँ उस पल को ,

 जब मै घुठनो के बल चलता था | 

मुझे याद है वह दिन ,

जब खटिए से गिर जाता था | 

मुझे याद है वह दिन ,

जब  मैं  मिट्टी से सना रहता था | 

माँ को डर था कही हम गिर न जाए ,

इसलिए उगंली पकड़कर चलता था | 

उन्हे मालूम था कही गिर  न जाए हम ,

मै याद करता हूँ उस पल | 

जब मै घुठनो के बल था चलता | | 

कवि : सुल्तान कुमार , कक्षा : 7th , अपना घर

शनिवार, 3 अप्रैल 2021

कविता : " इस प्यारे से संसार को "

" इस प्यारे से संसार को "

इस प्यारे से संसार को ,

प्रकृति ने पुष्पों से सजा दिया | 

  पुष्पों के कुछ पौधे से फिर ,

ये सुन्दर जगह बना दिया | 

इस प्यारे से संसार को ,

एक नया रूप  दिखा  दिया | 

सुन्दर  फूल -पौधों से सजा दिया ,

जगह  हमारा  सुन्दर था | 

और  सुन्दर बना दिया ,

कवि : महेश कुमार , कक्षा : 7th , अपना घर

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

कविता : " उपवन की हरयाली में "

"  उपवन की हरयाली में "

 उपवन की हरयाली में ,

दोस्ती की गहराई में | 

मौज मस्ती की बातो में ,

कब औऱ कैसे हो गया शाम | 

दिन हो या दोपहर ,

गर्मी लगती है बहुत जहर | 

लोग धुप में काम कर  के जाते है कहर  ,

ऐसी लिए धुप में ज्यादा देर मत ठहर | 

बगीचा हमेशा  हरा दिखे ,

दोस्ती ओर प्यार से भरा दिखे | 

कवि : पिंटू कुमार , कक्षा 6th , अपना घर 

 

बुधवार, 31 मार्च 2021

कविता : " रंग की भरमार में "

 " रंग की भरमार में "

रंगो  की भरमार में ,

होली  की त्योहर  में | 

हर व्यक्ति को रंग है लगाना ,

बचने वालो को न  छोड़ना | 

अबीर उड़े गुलाल उड़े और जाकर सब पर पड़े ,

बच्चे पिचकारी में रंग भरे |

बाकी लोगो को रंगने के  लिए तंग करे ,

होली में हर को  मिलकर हुड  डंग करे |

जो होली न खेलता हो उसका भी मन करे ,

कवि : विक्रम कुमार , कक्षा : 10th , अपना घर

 

मंगलवार, 30 मार्च 2021

कविता :" होली का त्योहार है भाई "

" होली का त्योहार है भाई "

होली का त्योहार है भाई ,

खाओ गुझिया और  मिढ़ाई | 

लेकर  रंग दोस्तो को खुब दौड़ाई  ,

किसी के ऊपर रंग लगाए |

 किसी को नाली में फेक आई ,

होली का त्योहार  है भाई | 

रंगो का बरसात है आई ,

उसमे हम खुब नहाई | 

होली  का  त्योहार है आई ,

कवि : कामता कुमार , कक्षा : 9th , अपना घर 

 

 

 

रविवार, 28 मार्च 2021

कविता :"' किसान ने देश के लिए बहुत कुछ किया "

" किसान ने देश के लिए  बहुत कुछ किया "

किसान ने देश के लिए  बहुत कुछ किया ,

पर सरकार ने उसे धोखा दिया |

 तीन बील उन्होने पास किया ,

किसानो को तहस -नहस कर दिया |

देश के लिए भोजन उत्पन किया ,

तीन  बिल उपास  करने  के लिए नाकर दिया | 

इस बार की  सरकार ने   मुँह  मोड़ लिया ,

तीन बिल उपास करवाने में | 

बहुत सारे किसानो नई अपना दम तोड़ दिया ,

कवि : अजय कुमार , कक्षा : 6th , अपना घर 

 

शनिवार, 27 मार्च 2021

कविता : "खत्म हो गए है एग्जाम मेरे "

" खत्म हो गए है एग्जाम मेरे "

खत्म हो गए है एग्जाम मेरे ,

सोचता हूँ क्या करुँगा सवेरे | 

खोलूँगा अब कहानियों का भण्डार ,

याद करुँगा  अब घर द्वार | 

चुट -कुले  कहानियाँ  जो मन में याद आए ,

जो अभी तक नहीं किया वो करुँगा | 

सिखुगा निखारूगा अब अपना  पॉवर ,

उपयोग करुँगा  अपना घर एक ऑवर | 

ज्ञान का भण्डार लेकर जाऊगा  सवेरे ,

एग्जाम खत्म तो ट्वेल्थ आना | 

कवि : प्रांजुल कुमार , कक्षा : 11th , अपना घर

शुक्रवार, 26 मार्च 2021

कविता : " जिंदगी की ये मोड़ कहाँ आ गई "

  " जिंदगी की ये मोड़ कहाँ आ गई "

जिंदगी की ये मोड़ कहाँ आ गई ,

दसवीं से आगे जाने में बीत गई | 

क्या पढू क्या न पढू तय करने मे समय बीत  गया ,

बाकी सभी लोगो का टेंथ एलेन्थ और ट्वेल्व्थ आ गया | 

और दसमी  पड़ते -पड़ते बोर हो गया   ,

पढू तो सब याद रहे मौज मस्ती में भूल जाऊ | 

अपना दुख किसी को न कह पाऊ ,

 पेपर हाथ में लू तो सब भूल जाऊ | 

पर नंबर न जाने कहाँ खो जाए ,

अब तो बोर्ड की घडी आ गई | 

और कोरोना बढ़ने की खबर आ गई ,

कवि : समीर कुमार , कक्षा : 10th , अपना घर

 

बुधवार, 24 मार्च 2021

कविता : " ये दसमी में क्या खाश है "

 " ये दसमी में क्या खाश है "

 ये दसमी में क्या  है खाश  ,

किस चीज की लगये बैठे है  आश | 

खेलने जाओ तो दसमी सुनने को मिलता  ,

  खाना खाने जाओ तो दसमी सुनने को मिलता | 

ना चैन से सोने को मिलता   ,

ना ही कही आराम से बैठने को | 

लगता है जैसे हिमालय का  दीवार खड़ा हो ,

जिसे तोडना बहुत जरूरी हो | 

सिर से लेकर आसमा तक ,

हर जगह दसमी की चर्चा खड़ी हो  | 

मनो कुछ पालो  खुशिया छिन गई ,

जिंदगी एक किताबी कीड़ा बन गया |

 ये दसमी में क्या खाश है ,

किस चीज की लगये बैठे है  आश  | 

कवि : सार्थक कुमार ,कक्षा : 10th , अपना घर 

 

 

मंगलवार, 23 मार्च 2021

कविता : " समाप्त हो रहा है कोरोना महामारी "

 " समाप्त हो रहा है कोरोना महामारी "

 समाप्त हो  रहा है कोरोना महामारी ,

फिर शुरू होगा  स्कूल हमारा  | 

काश कोरोना न होता ,

सभी लोग नींद भर सोता | 

फिर  से तहलका मचा रहा है ,

समाप्त हो रहा कोरोना महामारी | 

घर के  बाहर जाना शुरू  हुआ हमारा ,

किसी को छोड़ रहा किसी को मिचोड रहा | 

कोई बच रहा कोई बचा रहा ,

 कोरोना धीरे -धीरे बढ़ते ही जा रहा है | 

कवि : अवधेश  कुमार , कक्षा : 7th , अपना  घर

सोमवार, 22 मार्च 2021

कविता : " जीने में क्या बुराई है "

 " जीने में क्या बुराई है "

जीने में क्या बुराई है,

चाहे हम जैसे जिए | 

पर  जीना तो हमें  है ,

चाहे ख़ुशी से  जिए | 

 और  चाहे दुखी होकर  जिए ,

जीना तो हर हालत में है | 

ऐसे जीने में  क्या फायदा ,

जिसमे कोई  मजा ही नहीं | 

जिओ तुम खुल के जिओ ,

बिना डर  के बिना शर्म के | 

 जिओतो खुलकर जिओ ,

कवी: नितीश कुमार  , कक्षा :10th , अपना घर 


 

 

रविवार, 21 मार्च 2021

कविता : " एग्जाम के दिन "

" एग्जाम के दिन "

एग्जाम के दिन ,

 कहते है गिन -गिन |

सोमवार ,मंगलवार ,बुधवार ,

खाना पीना जीना दुश्वार | 

रात को जागो ,

सुबह उठो सवा चार | 

कॉपी पलट कर हो गए बोर ,

पसंद नहीं है पढ़ने के शोर | 

जपते है सब भगवान् की धुन ,

एग्जाम के दिन | 

कहते है गिन -गिन  ,

कवि : अखिलेश कुमार  , कक्षा :10th , अपना  घर

शनिवार, 20 मार्च 2021

कविता :" जब -जब मै अकेला रहता हूँ "

                                                   " जब -जब मै  अकेला रहता हूँ  "

जब -जब मै  अकेला रहता हूँ ,

घर की याद  मुझको  आता है | 

मम्मी मुझको अपनी गोद  में बैठाती ,

जब मै उसके पास जाती | 

इतना छोटा मेरा  भाई ,

 नहीं  करना था ईटो की पथाई | 

जब तेरा उम्र है करने की पढ़ाई ,

एक मेरी  बहन | 

जिसकी उम्र है खेल -कूद  की ,

नहीं कर पाती है पढ़ाई |


कवि : पिंटू कुमार , कक्षा :5th , अपना घर 

 

शुक्रवार, 19 मार्च 2021

कविता : बदला नहीं बचपन

 " बदला नहीं  बचपन " 

 बदल रही है वो सुनशान सी गालियाँ ,

 बदल रही है वो पेड़ों की कलियाँ | 

बदल रहा है अब वो अवतार ,

बदल रहा है अब घर और द्वार | 

बदला नहीं है बस वो मुस्कुराहटें,

बचपन की मीठी - मीठी फुसफुसाहटें | 

बदल  चुकी है चप्पल के नंबर,

बदल चुका है वस्त्र और अम्बर | 

बदल गया है गलों का वो काजल,

बदल  गया है माथे का वो चन्दन | 

बदला नहीं तो वो मन का दुलार,

बचपन से अभी तक का ढेरों प्यार | 

 

बदल रही है हर साल वो किताबें,

बदल रही है वो धीरे चलती कदमें | 

बदल रहे है दोस्त और साथी,

बदल रहे है पेन और कॉपी | 

बदला नहीं वो बस जुनूनी पढाई,

भूला नहीं वो बचपन की लड़ाई | 

 कवि ; प्रांजुल कुमार , कक्षा : 11th ,  अपना घर