शनिवार, 8 जनवरी 2011

कविता :खाऊँगा दही बड़ा


खाऊँगा दही बड़ा


मैं खाऊँगा दही बड़ा ,
खट्टा- मीठा दही बड़ा ....
खाने के लिए मैं रसोई में खड़ा ,
कब बनेगा दही बड़ा ....
तभी मेरे पीछे एक डंडा पड़ा ,
मैं खाऊँगा दही बड़ा .....

लेख़क :चन्दन कुमार
कक्षा :5
अपना घर

4 टिप्‍पणियां:

vallabh ने कहा…

kisne mara danda? pata karo aur mujhe batao.

nilesh mathur ने कहा…

दही बड़े के लिए तो मैं भी डंडा खा लूँगा!

चैतन्य शर्मा ने कहा…

मजेदार कविता ....

निर्मला कपिला ने कहा…

इतनी ठंड मे दही? मै तो नही खाऊँगी। अच्छी बाल रचना। बधाई।