शनिवार, 30 मई 2026

दूर कहीं गाव के कोने में

 कविता 

दूर कहीं गाव के कोने में 
अधूरा सपना लिये जी रहा है एक घर 
जो अँधेरे में रहकर शायद खोज रहा है 
उजाले का पल 
कच्ची चौखट पे पड़ी दरारों में 
भीतर से ही खुद उनसे पूुँछता है 
की खो न जाये इस घर का वज़ूद इस अंधियारे में 
जो इतना शांत होकर जीता है 
क्या तबाह न हो जाये इस समाज के धमकाने से 
सूख रही है इसकी दीवारे  
पूछ रही है चटकते हुए खपरैलों से 
 कबतलक इनको यूँ ही जीना है 
कितना और ज़माने से लड़ना है 
हश्र लिए कहाँ जाये ये शहरों में 
 कहीं खो न जाये अंधियारे में 

 

नाम- साहिल 

कक्षा-10 

कोई टिप्पणी नहीं: