गुरुवार, 11 जून 2020

कविता : देरी बा

" देरी बा "

हर इंसान के जिंदगी में कुछ न कुछ होला,
बस ओकरा के ऊ समझए के देरी बा | 
ऊ वो बदल सकेला अपनी जिंदगी के,
बस ओकरा के बदले के देरी बा | 
ऊ खोज सकेला दुःख के घड़ी में ख़ुशी,
 बस ओकरा समझदार बने के देरी बा | 
हर इंसान के मंजिल पावे के होला हुनर,
बस ओकरा के हुनर के पहचाने के देरी बा | 
ओहू बन सकेला एक बड़का ऑफिसर,
 बस ओकरा के पढ़ाई पे ध्यान देने के देरी बा | 

कवि : समीर कुमार , कक्षा : 10th , अपना घर   

कवि परिचय : यह कविता समीर के दवरा लिखी गई है जो की प्रयागराज के रहने वाले हैं | इस कविता का शीर्षक " देरी बा " है | इस कविता की खास बात यह है की समीर ने इसे भोजपुरी भाषा में लिखी है जो की बहुत प्रभावित करती है और प्रेरणादायिक है | 

1 टिप्पणी:

विश्वमोहन ने कहा…

वाह! लाजवाब!!!