शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

कविता : पहली किरण

"  पहली किरण "
सुबह की वह पहली किरण,
तन मन को छू कर जाती है | 
टूटे उम्मीदों के पिटारों को,
खुशियों से भर जाती है | 
अपनी तीव्रता का बखान न कर,
औरों का उत्साह बढ़ाती है | 
यूँ चमचमाती रोशनी से,
पूरे जगत में मोती बन बिखर जाती है | 
पूरे दिन भर के थकान को,
यूँ बदल कर चली जाती है | 

कवि : प्रांजुल कुमार , कक्षा : 11th , अपना घर

कवि परिचय : यह कविता प्रांजुल के द्वारा लिखी गई है जो की छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं | प्रांजुल को कवितायेँ लिखने का बहुत शौक है | पढ़लिखकर घर परिवार और समाज की सहायता करना चाहते हैं |