मंगलवार, 23 जून 2026

कविता: "बहस"

"बहस"
क्या अंत भी है ऐसी बात चीज का । 
सही जो लगता हो एक को । । 
तो दूसरे को गलत । 
क्या लगता है । । 
ऐसी बातो में । 
छिपा है कैसी रहस्य । । 
घंटो -घंटो रहते अड़े । 
करते रहते जिसपे बहस । । 
 निकलता है क्या सही समाधान। 
टाले गए सवालों का । । 
जिस बात चीत में । 
पूरी बात भी होती कहाँ?। । 
कर देते जिस तहस - नहस । 
क्या यही अधूरी बाते । । 
इंसानो में है एक बहस। । 
कवि
कवि: पिंटू कुमार, कक्षा: 11th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"


 

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