शुक्रवार, 4 अगस्त 2023

कविता : " सफर"

 " सफर"

 कहाँ से कहाँ आ गया 

और भी किधर है जाना 

अंजान हूँ हर एक अगले कदम का 

मैं तो सिर्फ चलता जा रहा हूँ 

न होश है न खबर 

मैं और मेरा सफर 

डरा हूँ सोंच उस बारे में 

जो आने वाला कल भर में है 

टूट बिखर या चलता ही बनूँगा 

इस अपनी एक सफर में थककर हारूंगा या बुझ कर 

फिर चमक खिलूँगा 

मैं बेघर इस ख़ामोशी सफर का 

बस है इंतजार  उस किनारे तक का 

मैं और मेरा सफर 

कवि :पिंटू कुमार ,कक्षा :8 

अपना घर

  

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