शनिवार, 15 अप्रैल 2017

mushikle

कविता =मुश्किलें  की आहत आई ,
ओठों में उदासी  सी छाई | 
वो फूल  का खिलना ,
वो तेज हवा का चलना | 
उससे डटकर खड़े रहना ,
पंखुडिया जैसे न छड़ना |   
इसे कहते है जिंदगी की पहले ,
पाँव का चढ़ना | 
वो चन्द्रमा की प्रकाश की तरह ,
बौछार करना |  
अँधेरी सी मुश्किलों में ,
प्रकाश को भरना | 
कभी न किसी मुशिकलों से ,
डरना | 
यही है मेरी चाहत आगे को ही ,
है बढ़ना ..... | 

                                                               कवि का परिचय: राज   "अपना घर" परिवार के सदस्य है। ये बिहार के रहने वाले है। इनका परिवार ईट भठ्ठों में प्रवासी मजदूर का कार्य करते है. राज  यंहा "आशा ट्रस्ट" के कानपुर केंद्र "अपना घर" में रहकर, शिक्षा ग्रहण कर रहे है। वर्तमान में ये कक्षा ८  th  के छात्र है। देवराज को कवितायेँ लिखना अच्छा लगता है। क्रिकेट के दीवाने है,  सुरेश रैना बहुत पसंद   है। राज  को डांस करना बहुत पसंद है। हमें उम्मीद है कि आपको इनकी ये नवीन रचना पसंद आएगी।                             

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