बुधवार, 5 जुलाई 2017

कविता :बाल गोपाला

 " बाल गोपाला "

लल्लन के लाल ,बाल गोपाला,
यशोदा का नटखट नंदलाला |
पूरे मथुरा में बजाता मुरली,
बंसी से आवाज़ निकलती सुरीली | 
मन को मोह लेने वाला,
मथुरा का था बाल गोपाल |
सुदामा संग चुराता मख्खन,
अद्भुद प्यारा था वो बचपन |
गौ चराता मुरली बजाता,
राधा संग प्रेम की बंसी बजाता |
गोपाला था तो बहुत कला,
फिर भी था एक सच्चा दिलवाला |
कवि : प्रांजुल कुमार , कक्षा : 8th ,अपनाघर 

कवि का परिचय : छत्तीसगढ़ के रहने वाले ये हैं  प्रांजुल | अपनाघर का सदस्य है | इनको कवितायेँ लिखने का बहुत शौक है | अपनी हर एक कविता को मन से लिखते है | खेलने का भी शौक है | इनके परिवार वाले मजदूरी का कार्य करते है | अपनाघर में रह कर ये अपनी शिक्षा को और भी मजबूत बना रहे है | हमें उम्मीद है कि इनकी कविता जरूर सबको पसंद आएगी | 


2 टिप्‍पणियां:

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत सुंदर रचना.
रामराम
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (07-07-2017) को "न दिमाग सोता है, न कलम" (चर्चा अंक-2659) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'