शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

इस बदलते मौसम के दिन

 कविता 

इस बदलते मौसम के दिन 
चल रही है पसीने के बिन 
रज़ाई है कम्बल है 
फिर भी ठंडी है 
मुश्किल हो गया है लोगो का नहाना 
सब ठंडी का नाम लेकर करेंगे बहाना 
बदलते मौसम के दिन 
अब कैसे रहे कम्बल के दिन 
हो रही है आजकल जल्दी शाम 
सुबह का नहीं ले रहा है नाम 
इस ठंडी के मौसम में 

ये कविता हमारे कवी नीरू के द्वारा लिखी गयी है | ये अपना घर में 2018 में आये थे | इनको कविता लिखना  बहुत पसंद है, ये इस वक्त कक्षा 10 के छात्र है | ये यहाँ के बहुत होनहार छात्र है | इनको अपना घर में रहते हुए 8  साल हो गए है | ये हर काम में यहाँ के मदद करते है और इनका चरित्र बहुत अच्छा है | 

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