कविता
दूर कहीं गाव के कोने में
अधूरा सपना लिये जी रहा है एक घर
जो अँधेरे में रहकर शायद खोज रहा है
उजाले का पल
कच्ची चौखट पे पड़ी दरारों में
भीतर से ही खुद उनसे पूुँछता है
की खो न जाये इस घर का वज़ूद इस अंधियारे में
जो इतना शांत होकर जीता है
क्या तबाह न हो जाये इस समाज के धमकाने से
सूख रही है इसकी दीवारे
पूछ रही है चटकते हुए खपरैलों से
कबतलक इनको यूँ ही जीना है
कितना और ज़माने से लड़ना है
हश्र लिए कहाँ जाये ये शहरों में
कहीं खो न जाये अंधियारे में
अधूरा सपना लिये जी रहा है एक घर
जो अँधेरे में रहकर शायद खोज रहा है
उजाले का पल
कच्ची चौखट पे पड़ी दरारों में
भीतर से ही खुद उनसे पूुँछता है
की खो न जाये इस घर का वज़ूद इस अंधियारे में
जो इतना शांत होकर जीता है
क्या तबाह न हो जाये इस समाज के धमकाने से
सूख रही है इसकी दीवारे
पूछ रही है चटकते हुए खपरैलों से
कबतलक इनको यूँ ही जीना है
कितना और ज़माने से लड़ना है
हश्र लिए कहाँ जाये ये शहरों में
कहीं खो न जाये अंधियारे में
नाम- साहिल
कक्षा-10
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