बाल सजग

(बच्चों का आकाश .... बच्चों के लिए)

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

बारीश का मौसम है आ गया

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 कविता  बारीश का मौसम है आ गया  काम हुई है थोड़ी गर्मी  बरसात का मौसम है आ गर्म  इससे पहले न हो रही थी बरसात  सिर्फ धुप धुप हो गए थे परेशां  ...
गुरुवार, 16 जुलाई 2026

बीत रहे है साल

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कविता  बीत रहे है साल  छोड़ते जा रहे है यादें  निकलता जा रहा है समय  याद नहीं आ रही क्या यार  चला गया है बहुत दूर  छोड़ गया है अपनी लहार बातों...

आज है रविवार

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 कविता  आज है रविवार  सभी करेंगे सफाई और करेंगे सफाई  लिखते है कविता और पड़ते है भाई  आज है रविवार  सोते है और मौज मस्ती करते है  आज है रविवा...
बुधवार, 15 जुलाई 2026

कितना लम्बा है ये सफर

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 कविता  कितना लम्बा है ये सफर  जहाँ कोई न आता है नजर  न छांव है न है मस्ती की डगर  कास छोटा होता ये सफर  जहां न है कोई घर  बस अति है पड़े ही ...
मंगलवार, 14 जुलाई 2026

बहुत अनजान है ये आसमां

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कविता  बहुत अनजान है ये आसमां  दिन में लोगों को अपनी रौशनी से है दिया जला  न जाने क्यों बेखबर है ये आसमां  न दे दिन में चलने हवा  न दे रात म...
सोमवार, 13 जुलाई 2026

कब से पड़ी हुई है रूखी सी जिन्दगी

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 कविता  कब से पड़ी हुई है रूखी सी जिन्दगी  बेजान सी है ये ख़ुशी  बदली नहीं ये दुःख की घडी  टूट चुकी है एक आशा बड़ी  छूट गयी सारि कड़ी  कब से पड़ी...
शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

न हो रही है बरसात

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 कविता  न हो रही है बरसात  गर्मी चल रही है साथ साथ  आसमान से बरसाने की है आस  लोग हो हाय बहुत परेशान  ये गर्मी को नहीं हो रहा अहसास  सिर्फ ध...
शनिवार, 27 जून 2026

ये खूबसूरत प्रकृति में

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कविता  ये खूबसूरत प्रकृति में  कैसे बिखर रही है लालिमा  श्रंगार करती दिख रहि है  शुशोभित है कितना  देखो खिलखिलाती फूलों को  हरी भरी सुकुमार ...
1 टिप्पणी:
गुरुवार, 25 जून 2026

तबाही मचा रहा है इस साल की गर्मी

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 कविता  तबाही मचा रहा है इस साल की गर्मी  बहुत परेशान कर रही है ये गर्मी  इतनी तेज धुप और ये लहरे  इतनी तेज गर्मी नहीं है होती थी पहले  बहुत...
मंगलवार, 23 जून 2026

कविता: "बहस"

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"बहस" क्या अंत भी है ऐसी बात चीज का ।  सही जो लगता हो एक को । ।  तो दूसरे को गलत ।  क्या लगता है । ।  ऐसी बातो में ।  छिपा है कैसी...
बुधवार, 17 जून 2026

गाँव की गलियों से निकलकर

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कविता  गाँव की गलियों से निकलकर  शहरों की गलियों में  भटक क्यों रहा हूँ इन अनजान गलियों में  गलियारे ही बचे है क्या  क्यों खो गए खेत कहाँ  क...
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BAL SAJAG
Kanpur, UP, India
प्यारे दोस्तों, बाल सजग एक हकीकत भरा प्रयास जिसके लिए हम सभी बच्चें कोशिश में लगे है. हमारे सपने, हमारी उमंगे हमको भी चाहिए एक जमीन जो हमारी हो, जिसके लिए किसी का मुहँ न देखना पड़े. हम भी लिखना चाहते है, सोचना चाहते है और घिसी-पिटी पढाई को छोड़ नया कुछ पढ़ना चाहते है, जो हमारे दोस्तों ने लिखा हो, जो हमने लिखा हो. बाल सजग एक ऐसा ही प्रयास है. हम सभी ईट-भठ्ठों पर काम करने वाले प्रवासी मजदूरों के बच्चें है. हमारे बचपन का अधिकतर समय ईट की पथाई में गुजरा है, दहकतियों भठियों में झुलसा है. ईट-भठ्ठों की तपिश में न मालूम मासूम बचपना कंहा खो गया. हमको नहीं मालूम की जांत- पात, उंच - नीच क्या होती है, और हम जानना भी नहीं चाहते है ... हम जानना चाहते है कि, शेर खीरा ककड़ी क्यों नहीं खाता, आसमान के तारों पर कौन रहता है. हम सब कुछ जानना चाहते है, जो हमारे मन में आते है. तमाम ख्वाब आपके है ,पर कुछ हमारे भी है. हम अपने ख़्वाबों को आपके साथ जीना चाहते है. .. "बाल सजग" टीम
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