गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

कुछ भी कहते हो तुम

 कविता 

कुछ भी कहते हो तुम 
जरा गौर किया करो अपने शब्दों  पर
तेरी उन बातों पर मेरा मन ढोल गया 
मई अपना नाम जानकर भी उसे भूल गया 
कुछ भी ङ्कह्ते हसो तुम 
तेरी इन बातो पर मेरा मन चंचल होता है 
मन मने या न मने फिर भी पिघलता है 
तेरी तसवीर मेरे मन कोने में कहीं कैद है \
इसका भी कोई फयदा नहीं 
क्योंकि उसका कोई वजूद नहीं 
नाम- नीरू 
कक्षा - 10  

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