बुधवार, 17 जून 2026

गाँव की गलियों से निकलकर

कविता 

गाँव की गलियों से निकलकर 
शहरों की गलियों में 
भटक क्यों रहा हूँ इन अनजान गलियों में 
गलियारे ही बचे है क्या 
क्यों खो गए खेत कहाँ 
कहाँ खो गयी वो बूढ़ी नजरे 
जो रात रात भर जागकर हाल पूछती थी 
सब बदल सा गया है 
है लगता है की गाँव गलियों से निकलकर 
मई खो गया हूँ 
या फिर मैं गाओ को  भूल सा गया हूँ 
नाम - साहिल कुमार 
कक्षा -10 


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