सोमवार, 19 सितंबर 2022

कविता : " डल के ये जो शाम आई है "

" डल के ये जो शाम आई है "

 डल के ये जो शाम आई है |

देख कितने रंग लाई है ,

जगमगा उठा सारा आँगन |

लगता जैसे आया सावन ,

मन मोह लेता  है दृश्य |

मुरझाये फूल भी ,

महकेंगे अवश्य |

एक नया उमंग आई है ,

डल के ये जो शाम  आई है | 

कवि : देवराज कुमार , कक्षा : 12th 

अपना घर

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें